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CJP के संसद मार्च में मीडिया पर नाराज़गी, रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को लेकर आपस में भिड़े पत्रकार

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नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संसद मार्च के दौरान मीडिया को लेकर प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी का मामला अब पत्रकारों के बीच बहस का विषय बन गया है। प्रदर्शन के दौरान कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थानों के खिलाफ नारेबाजी की गई और रिपोर्टिंग कर रहे कुछ पत्रकार भी प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी की जद में आ गए।मामले को लेकर पत्रकारों के बीच सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष का कहना है कि मीडिया संस्थानों की नीतियों या कवरेज से नाराज़गी अपनी जगह हो सकती है, लेकिन ग्राउंड पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को निशाना बनाना उचित नहीं है।पत्रकार पूनम पांडे ने प्रदर्शन के दौरान मीडिया के खिलाफ नाराज़गी से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा कि मीडिया से नाराज़गी हो सकती है, लेकिन रिपोर्टर को टारगेट करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि रिपोर्टर ही जमीन पर उतरकर धूप और

सोमवार को सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान एक आंदोलनकारी महिला

बारिश के बीच खबरों को कवर करते हैं और नाराज़गी सही जगह पर जाहिर होनी चाहिए।वहीं, अंग्रेजी अखबार द हिन्दू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि टीवी पर नफरत फैलाने वाले एंकरों, प्रेजेंटरों और वरिष्ठ पत्रकारों को टीवी रिपोर्टरों से अलग करके देखना जरूरी है। उनके मुताबिक, अधिकांश टीवी रिपोर्टर बेहद मेहनत से ग्राउंड पर काम करते हैं।मीडिया की भूमिका पर फिर उठे सवालCJP के प्रदर्शन के दौरान सामने आए इस घटनाक्रम ने भारत में मीडिया की भूमिका और उसकी निष्पक्षता को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। पिछले कुछ वर्षों में मीडिया संस्थानों पर सरकार समर्थक या सरकार विरोधी होने के आरोप लगते रहे हैं।इसी वजह से बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान मीडिया कवरेज को लेकर प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी भी कई बार सामने आती रही है। हालांकि, सवाल यह है कि किसी मीडिया संस्थान की संपादकीय नीति से असहमति का गुस्सा क्या मौके पर मौजूद पत्रकारों पर निकाला जाना उचित है?पत्रकारों का एक वर्ग मानता है कि संस्थान और रिपोर्टर की भूमिका को अलग-अलग समझना जरूरी है। वहीं, दूसरा पक्ष मीडिया की जवाबदेही और उसकी कवरेज को लेकर सवाल उठाता रहा है।CJP संसद मार्च के दौरान मीडिया को लेकर सामने आई नाराज़गी ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विरोध प्रदर्शन में मीडिया की आलोचना की सीमा क्या होनी चाहिए और ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान कैसे सुनिश्चित किया जाए।

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