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दतिया उपचुनाव में कांग्रेस की वापसी, MP की सियासत में BJP-कांग्रेस 2-2 पर बराबर; क्या जनता ने ‘दलबदल और थोपे गए चुनाव’ को नकारा?

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भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने एक बार फिर सियासी समीकरणों को चर्चा में ला दिया है। दतिया में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने भाजपा को हराकर न केवल पार्टी की परंपरागत सीट पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रखा, बल्कि वर्ष 2023 के बाद हुए विधानसभा उपचुनावों में भाजपा और कांग्रेस को 2-2 की बराबरी पर ला खड़ा किया है। घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी को 6053 वोटों के अंतर से हराया। दतिया का यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सीट पहले कांग्रेस के पास थी। कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद यहां उपचुनाव की नौबत आई थी। कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर जीत दर्ज कर यह संदेश दिया कि दतिया में पार्टी का जनाधार अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश में अब तक चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं। इनमें से दो सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं। सबसे पहले बुधनी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विदिशा से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा के रमाकांत भार्गव ने जीत हासिल की। इसके बाद छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट पर कांग्रेस विधायक कमलेश शाह के भाजपा में शामिल होने के बाद उपचुनाव हुआ, जिसमें भाजपा ने जीत दर्ज की। लेकिन इसके बाद तस्वीर बदल गई। विजयपुर में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए रामनिवास रावत को कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा ने हरा दिया। अब दतिया में भी कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा को मात दे दी। इस तरह चार उपचुनावों का आंकड़ा भाजपा और कांग्रेस के बीच 2-2 पर आ गया।

दतिया में कांग्रेस ने बचाया अपना गढ़

दतिया विधानसभा सीट का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच लंबे समय से सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है। भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने 2008, 2013 और 2018 में लगातार तीन बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी। हालांकि 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराकर भाजपा का कब्जा खत्म कर दिया था। अब उपचुनाव में घनश्याम सिंह की जीत ने कांग्रेस को एक बार फिर मजबूत किया है। घनश्याम सिंह पहले भी 1993 और 2003 में दतिया से विधायक रह चुके हैं। ऐसे में उनकी जीत को कांग्रेस के लिए पुराने जनाधार की वापसी के तौर पर भी देखा जा रहा है।

क्या जनता ने ‘दलबदल’ की राजनीति को नकारा?

दतिया और विजयपुर के नतीजे मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा संकेत भी दे रहे हैं। दोनों सीटों पर उपचुनाव अलग-अलग परिस्थितियों में हुए, लेकिन दोनों जगह सत्ताधारी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। विजयपुर में कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत के भाजपा में जाने के बाद चुनाव हुआ था, जबकि दतिया में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद सीट खाली हुई। इन दोनों चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस यह दावा कर सकती है कि मतदाताओं ने ऐसे उपचुनावों को स्वीकार नहीं किया, जो राजनीतिक परिस्थितियों या विधानसभा सीट खाली होने के बाद अस्तित्व में आए। हालांकि भाजपा के लिए यह परिणाम एक चेतावनी जरूर है कि विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत के बावजूद उपचुनावों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि और मतदाताओं की नाराजगी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

कांग्रेस के विधायकों की संख्या फिर 65

दतिया में जीत के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या एक बार फिर 65 हो जाएगी। वहीं भाजपा अब भी विधानसभा में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में है। ऐसे में दतिया का परिणाम सरकार के बहुमत पर कोई असर नहीं डालता, लेकिन विपक्ष के लिए यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जीत जरूर है। कांग्रेस इस जीत को भाजपा सरकार के खिलाफ जनता के रुख के तौर पर पेश कर सकती है, जबकि भाजपा के सामने अब चुनौती यह होगी कि वह उपचुनावों में लगातार मिल रही हार के कारणों की समीक्षा करे।

नरोत्तम मिश्रा के बाद दतिया में फिर कांग्रेस का कब्जा

दतिया की राजनीति में डॉ. नरोत्तम मिश्रा का लंबे समय तक प्रभाव रहा है। 2008 से 2018 तक लगातार तीन चुनाव जीतकर उन्होंने भाजपा को मजबूत स्थिति में पहुंचाया था। लेकिन 2023 में राजेंद्र भारती और अब उपचुनाव में घनश्याम सिंह की जीत से कांग्रेस ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ फिर मजबूत करने का संकेत दिया है। दतिया का चुनाव परिणाम सिर्फ एक विधानसभा सीट की हार-जीत नहीं है। यह नतीजा भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक संदेश लेकर आया है। एक ओर कांग्रेस के लिए यह लगातार दूसरी उपचुनाव जीत है, तो दूसरी ओर भाजपा के लिए यह सोचने का समय है कि विधानसभा चुनाव की बड़ी जीत के बावजूद उपचुनावों में मतदाता अलग फैसला क्यों सुना रहे हैं।

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