दतिया। मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी तस्वीर की हो रही है, तो वह है दतिया की चुनावी सभा में मंच पर भावुक होकर रो पड़े भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा। टिकट कटने के बाद पहली बार सार्वजनिक मंच पर भावुक हुए नरोत्तम मिश्रा के आंसुओं ने दतिया उपचुनाव की सियासत को नया मोड़ दे दिया है। भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के नामांकन कार्यक्रम में नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और अब वे आशुतोष तिवारी को जिताने के लिए “एक-एक घर जाकर शीश नवाएंगे”। यह कहते-कहते वे भावुक हो गए और मंच पर ही उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बाद में कुर्सी पर बैठने के बाद भी वे खुद को संभाल नहीं सके। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या ये आंसू समर्पण के थे या सियासी पीड़ा के?
दतिया की राजनीति में वर्षों तक भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा रहे नरोत्तम मिश्रा को इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया। टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया, राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया और पार्टी के खिलाफ नाराजगी भी जताई थी। बाद में नरोत्तम मिश्रा ने स्वयं कार्यकर्ताओं से शांत रहने और पार्टी प्रत्याशी के समर्थन की अपील की। अब सवाल यह है कि मंच पर छलके आंसू कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ पाएंगे या टिकट कटने से पैदा हुई नाराजगी अभी भी भीतर ही भीतर सुलग रही है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नरोत्तम मिश्रा का दतिया में मजबूत जनाधार और संगठन पर प्रभाव रहा है। ऐसे में उनका पूरी ताकत से चुनाव प्रचार में उतरना भाजपा के लिए राहत की बात हो सकती है। वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे भाजपा की अंदरूनी असहजता और टिकट वितरण से उपजी नाराजगी के रूप में भी पेश करने की कोशिश कर रहा है। दतिया उपचुनाव अब केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक मुकाबला नहीं रह गया है। यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा बन गया है कि नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत प्रभाव, उनके समर्थकों की नाराजगी और अब उनके भावुक संदेश का मतदाताओं पर कितना असर पड़ता है।














