उज्जैन। जिस हाईवे परियोजना पर करीब 2600 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, अगर उसका हिस्सा बार-बार धंसने लगे तो सवाल सिर्फ सड़क की मजबूती पर नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर भी उठना तय है। उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड फोरलेन हाईवे का करीब 500 मीटर हिस्सा तकनीकी समस्या के चलते दोबारा खोदकर बनाए जाने की तैयारी है। खास बात यह है कि पिछले कुछ महीनों में इसी मार्ग पर सड़क के धंसने की दूसरी घटना सामने आई है।

पहले सड़क बनी, फिर धंसी और अब दोबारा होगी खुदाई
उज्जैन-देवास रोड पर प्रेमनगर-चंदेसरी क्षेत्र में रेलवे ब्रिज के पास सड़क के एक हिस्से में धंसाव और दरारों की स्थिति सामने आई। भराव वाले हिस्से में पानी के रिसाव की बात भी सामने आई, जिसके बाद निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े हुए। मामले के बाद NHAI ने प्रभावित हिस्से को हैंडओवर से पहले तोड़कर तकनीकी मानकों के मुताबिक दोबारा तैयार कराने के निर्देश दिए हैं। अब करीब 500 मीटर हिस्से को जमीन की गहराई तक खोलकर उसकी तकनीकी खामी दूर करने की प्रक्रिया की जा रही है। यानी जिस सड़क पर पहले ही करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, उसी हिस्से पर दोबारा मशीनें चलेंगी, खुदाई होगी और फिर निर्माण किया जाएगा।
सात महीने में दूसरी बार धंसाव
यह पहली बार नहीं है जब इस हाईवे के निर्माण पर सवाल खड़े हुए हैं। इससे पहले 6 फरवरी को भी करीब 200 मीटर सड़क के धंसने की बात सामने आई थी। अब एक बार फिर सड़क के हिस्से में समस्या आने से परियोजना की गुणवत्ता और निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। निर्माण एजेंसी GVR के सीनियर इंजीनियर अमित राय के मुताबिक, IIT दिल्ली की जांच में करीब 100 से 200 मीटर हिस्से में तकनीकी समस्या सामने आई थी। उनका कहना है कि भविष्य में दोबारा ऐसी स्थिति न बने, इसलिए प्रभावित क्षेत्र को लगभग 500 मीटर तक खोलकर नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।

वायरल वीडियो से मचा भ्रम, कंपनी ने दी सफाई
धंसाव और निर्माण कार्य से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद यह दावा भी फैलने लगा कि प्रेमनगर का पूरा ब्रिज गिर गया है। हालांकि निर्माण कंपनी ने इस दावे को खारिज किया है। कंपनी के सीनियर इंजीनियर अमित राय का कहना है कि वायरल वीडियो में दिखाया गया ब्रिज इस स्थान का नहीं है। उनके अनुसार यहां निर्माणाधीन हिस्से में रैंप और प्रभावित भाग को तकनीकी प्रक्रिया के तहत दोबारा तैयार किया जा रहा है। यानी पूरा ब्रिज ढहने की बात सही नहीं बताई गई है, लेकिन सड़क के प्रभावित हिस्से को तोड़कर दोबारा बनाने की कार्रवाई जरूर की जा रही है।
2600 करोड़ की परियोजना, फिर गुणवत्ता पर सवाल क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर बाद की तकनीकी जांच में निर्माण में खामी सामने आ सकती है, तो निर्माण के दौरान गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई?
- निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की जांच किसने की?
- काम की गुणवत्ता की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
- निर्माण पूरा होने से पहले तकनीकी निरीक्षण में क्या सामने आया?
- अगर तकनीकी खामी निर्माण स्तर पर थी तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
- दोबारा निर्माण की लागत कौन वहन करेगा?
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मामला सिर्फ कुछ मीटर सड़क के खराब होने का नहीं है। सड़क दोबारा बनाने का मतलब है कि पहले किए गए काम और उस पर खर्च हुए संसाधनों की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े होना।
एक साल से ज्यादा देरी, अभी भी अधूरा हाईवे
उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड फोरलेन परियोजना की कुल लंबाई करीब 136 किलोमीटर बताई जा रही है। परियोजना तय समयसीमा से आगे निकल चुकी है और अभी भी इसका एक बड़ा हिस्सा पूरा होना बाकी है। चंदेसरी से खेड़ा खजूरिया के बीच करीब 41 किलोमीटर का हिस्सा निर्माणाधीन बताया जा रहा है। इस पैकेज की लागत करीब 900 करोड़ रुपये है और इसका काम GVR कंस्ट्रक्शन से जुड़ा है। निर्माण में देरी के पीछे रेलवे से जुड़ी अनुमतियों और तकनीकी औपचारिकताओं को भी एक वजह बताया गया है।
सिंहस्थ से पहले हाईवे पूरा करने की चुनौती
उज्जैन में सिंहस्थ को देखते हुए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में सिर्फ निर्माण की नई तारीख तय करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह है कि सड़क समय पर बने और बनने के बाद टिकाऊ भी साबित हो। NHAI की ओर से प्रभावित हिस्से को तकनीकी खामी दूर कर दोबारा तैयार करने और निर्धारित समयसीमा में यातायात शुरू कराने का लक्ष्य बताया गया है। लेकिन जनता का सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि हाईवे कब तैयार होगा? सवाल यह भी है कि जो सड़क करोड़ों रुपये खर्च करके तैयार की जा रही है, वह कितने साल टिकेगी? क्योंकि सड़क मशीनों से दोबारा बनाई जा सकती है, लेकिन बार-बार निर्माण और धंसाव के बाद उठे सवालों से जनता का भरोसा दोबारा हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।














