कोर्ट ने कहा- नौकरी या दूसरी वजह से पति जहां जाए, पत्नी का हर जगह साथ जाना जरूरी नहीं; पति को ₹7 लाख गुजारा भत्ता देने का आदेश

चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने लंबे समय से अलग रह रहे एक दंपती के तलाक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हर जगह पति के पीछे वोडाफोन के विज्ञापन वाले पग डॉग की तरह चलती रहे। अदालत ने स्पष्ट किया कि नौकरी या अन्य परिस्थितियों के कारण पति को जिस शहर में जाना पड़े, पत्नी का हर बार उसके साथ जाना अनिवार्य नहीं है। मामला करीब 34 साल पहले शादी करने वाले दंपती से जुड़ा है, जो पिछले लगभग 16 वर्षों से अलग रह रहे थे और उनके चार बच्चे हैं। पति की उम्र फिलहाल 67 वर्ष बताई गई है। पति के अनुसार, वह नौकरी के सिलसिले में तमिलनाडु के शिवगंगा से मुंबई चला गया था, लेकिन उसकी पत्नी उसके साथ नहीं गई। इसी आधार पर उसने 2014 में शिवगंगा फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की और पत्नी पर किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने का आरोप भी लगाया। सितंबर 2021 में फैमिली कोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि पति खुद नौकरी के लिए मुंबई गया और पत्नी को साथ नहीं ले गया, इसलिए वह अपनी ही गलती का फायदा उठाकर तलाक नहीं मांग सकता। इसके बाद पति ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट में दोनों पक्षों के बीच समझौते की संभावना तलाशने की कोशिश की गई, लेकिन बातचीत से कोई समाधान नहीं निकला। अदालत ने पाया कि पति-पत्नी के रिश्ते में लंबे समय से गहरी कड़वाहट बनी हुई है और करीब 16 साल से अलग रहने के बाद दोबारा साथ आने की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए माना कि लंबे समय तक अलगाव, वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह खत्म हो जाना और साथ रहने की संभावना समाप्त होना परिस्थितियों के आधार पर मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दंपती को तलाक की मंजूरी दे दी। हालांकि, अदालत ने पति को पत्नी के लिए ₹7 लाख गुजारा भत्ता देने का भी आदेश दिया। पति की ओर से लगाए गए अवैध संबंधों के आरोप को हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति को कथित रूप से पत्नी का प्रेमी बताया गया था, उसे मामले में पक्षकार ही नहीं बनाया गया था। ऐसे में केवल आरोप के आधार पर अवैध संबंध साबित नहीं माना जा सकता। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की पीठ ने मामले में यह फैसला सुनाया।














