बालाघाट के बिरसा ब्लॉक के विशेष संरक्षित बैगा अंचल में बच्चों की मौत का मामला अब स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अडोरी, बोंदारी, कोरका और कुंडेकसा सहित प्रभावित गांवों में बच्चों की मौत के बाद सामने आई जांच रिपोर्ट में मीजल्स यानी खसरा संक्रमण की पुष्टि हुई है। जांच में मलेरिया को भी बच्चों की मौत के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि जिन बच्चों में मीजल्स संक्रमण मिला, वे नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे। यानी जिस वैक्सीन से इस बीमारी से बचाव संभव था, उसका सुरक्षा कवच इन बच्चों तक नहीं पहुंच सका। अब स्वास्थ्य विभाग 20 अगस्त से 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए विशेष मीजल्स-रूबेला टीकाकरण अभियान शुरू करने जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर बीमारी की जानकारी पहले ही मिल गई थी, तो समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
बालाघाट के बिरसा ब्लॉक के बैगा अंचल में बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने जांच और स्क्रीनिंग का दायरा बढ़ाया है। आईसीएमआर सहित अन्य स्वास्थ्य संस्थानों की जांच में मीजल्स संक्रमण की पुष्टि हुई है। इसके साथ ही मलेरिया को भी बच्चों की मौत के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है। जांच में एक अहम बात सामने आई कि मीजल्स से संक्रमित पाए गए बच्चे नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे। ऐसे में अब स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सभी बच्चों की पहचान करना है, जिन्हें अब तक टीकाकरण का लाभ नहीं मिल पाया। इसी को देखते हुए 20 अगस्त से विशेष मीजल्स-रूबेला टीकाकरण अभियान शुरू किया जा रहा है। अभियान के तहत 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों को वैक्सीन देने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रशासन के मुताबिक प्रभावित क्षेत्र में अब तक 2 हजार 900 से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इनमें करीब 650 सिम्पटम वाले लोग मिले। प्रशासन का कहना है कि इनमें से 135 बच्चों का उपचार पूरा हो चुका है, जबकि बाकी मरीजों का इलाज और निगरानी जारी है। कलेक्टर के मुताबिक फिलहाल कोई भी मरीज गंभीर स्थिति में नहीं है और प्रभावित क्षेत्र में हालात सामान्य हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित गांवों में लगातार निगरानी कर रही हैं। मरीजों के स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है और टीकाकरण से छूटे बच्चों की पहचान की जा रही है। लेकिन इस पूरे मामले ने सिर्फ बीमारी पर नहीं, बल्कि टीकाकरण व्यवस्था की पहुंच पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्योंकि जिन बच्चों में मीजल्स संक्रमण पाया गया, अगर वे नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे, तो सवाल उठता है कि विशेष संरक्षित जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की नियमित टीमें कितनी प्रभावी तरीके से काम कर रही थीं?

बीमारी के साथ कुपोषण की चुनौती
बालाघाट की घटना में एक तरफ मलेरिया और मीजल्स संक्रमण की चुनौती सामने आई है, तो दूसरी तरफ आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों के कुपोषण का मुद्दा भी गंभीर है। ग्रामीण मध्य प्रदेश में बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर सामने आए आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि बच्चों को बीमारी से बचाने वाला टीकाकरण और उन्हें मजबूत रखने वाला पोषण—दोनों व्यवस्थाएं जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी हैं? मिशन पोषण 2.0 के तहत छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं तक नियमित पोषण आहार पहुंचाने का प्रावधान है। लेकिन मध्य प्रदेश में पोषण आहार की सप्लाई व्यवस्था में बदलाव के दौरान व्यवधान की बात भी सामने आई है। महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने भी माना है कि व्यवस्था बदलने के दौरान कुछ समय के लिए पोषण आहार की सप्लाई प्रभावित हुई थी।
अब सबसे बड़े सवाल
बालाघाट में बच्चों की मौत के मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पहला सवाल— अगर प्रभावित क्षेत्र में बीमारी की जानकारी पहले ही मिल गई थी, तो समय रहते व्यापक जांच और टीकाकरण अभियान क्यों नहीं चलाया गया?
दूसरा सवाल— नियमित टीकाकरण से बच्चे कैसे छूट गए? क्या स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में कोई अंतर था?
तीसरा सवाल— अगर मीजल्स और मलेरिया संक्रमण बच्चों की मौत के प्रमुख कारण रहे, तो शुरुआती स्तर पर इनकी पहचान और उपचार में क्या कमी रही?
चौथा सवाल— आदिवासी और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं की नियमित निगरानी कौन करेगा?
और सबसे बड़ा सवाल— क्या इस पूरे मामले में केवल नया टीकाकरण अभियान ही समाधान है, या फिर पहले हुई देरी और लापरवाही की भी जवाबदेही तय होगी?
बालाघाट के बैगा अंचल में बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य, टीकाकरण और पोषण व्यवस्था को एक साथ सवालों के घेरे में ला दिया है। अब प्रशासन विशेष टीकाकरण अभियान शुरू करने की तैयारी में है और प्रभावित क्षेत्र में लगातार निगरानी का दावा किया जा रहा है। लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं कि अब क्या किया जा रहा है? सवाल यह भी है कि जो काम समय पर होना चाहिए था, वह पहले क्यों नहीं हुआ? क्योंकि किसी भी स्वास्थ्य संकट में बाद की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि बीमारी के संकेत मिलते ही समय रहते कार्रवाई हो—ताकि अगली बार किसी परिवार को अपने बच्चे को खोने का दर्द न झेलना पड़े।



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