सरवनंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की 1990 में आतंकियों ने हत्या की थी; जम्मू, बारामूला, शोपियां और अनंतनाग समेत कई जगहों पर SIA ने की तलाशी, पुराने केस में नए सुराग तलाशने की कोशिश।

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के दौर के एक पुराने और चर्चित हत्याकांड की जांच एक बार फिर तेज हो गई है। स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने बुधवार को वर्ष 1990 में हुए कश्मीरी पंडित पिता-पुत्र की हत्या के मामले में जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में एक साथ 9 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई जम्मू, बारामूला, शोपियां और अनंतनाग समेत कई स्थानों पर की गई। एजेंसी की कार्रवाई का उद्देश्य करीब तीन दशक पुराने मामले में नए सुराग और साक्ष्य जुटाना बताया जा रहा है।
यह मामला कश्मीरी पंडित लेखक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता सरवनंद कौल ‘प्रेमी’ और उनके बेटे वीरेंद्र कौल के अपहरण और हत्या से जुड़ा है। दोनों दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के कोकरनाग क्षेत्र के सोफ शाली गांव के रहने वाले थे। सरवनंद कौल प्रेमी अपने साहित्यिक योगदान, सामाजिक कार्यों और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रियता के लिए जाने जाते थे। वे कश्मीर में सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता की बात करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल थे। मामले के उपलब्ध विवरण के अनुसार, अप्रैल 1990 के आखिर में हथियारबंद आतंकियों ने सरवनंद कौल प्रेमी के घर में घुसकर उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए मजबूर किया था। उनके बेटे वीरेंद्र कौल ने भी पिता के साथ जाने की जिद की और उनके साथ चले गए। इसके बाद दोनों की हत्या कर दी गई। कुछ स्रोतों के मुताबिक दोनों के शव बाद में पेड़ से लटके हुए मिले थे। घटना के बाद परिवार को भारी सदमा लगा और उन्हें अपना घर छोड़कर कश्मीर से बाहर जाना पड़ा। सरवनंद कौल प्रेमी सिर्फ एक लेखक और कवि ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक और गांधीवादी विचारों से जुड़े व्यक्ति के तौर पर भी उनकी पहचान थी। उनकी साहित्यिक गतिविधियों में कश्मीरी भाषा और संस्कृति के साथ-साथ धार्मिक एवं सामाजिक विषयों पर लेखन और अनुवाद का काम भी शामिल था। उनकी हत्या को उस दौर में कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ हुई लक्षित हिंसा की घटनाओं में एक महत्वपूर्ण मामला माना गया। पिता-पुत्र की हत्या के बाद मामला स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक डोरू पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हुई थी, लेकिन लंबे समय तक आरोपियों का पता नहीं चल पाया। बाद में मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी और केस को अनट्रेस्ड के तौर पर बंद किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। वर्षों बाद इस मामले को फिर जांच के दायरे में लाया गया और अब इसकी जांच स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) कर रही है। इस मामले में पीड़ित परिवार लंबे समय से न्याय की मांग करता रहा है। वर्ष 2020 में परिवार की ओर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में भी शिकायत की गई थी। बाद में NHRC ने मामले में जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से देरी पर गंभीर टिप्पणी की थी। आयोग ने कहा था कि पीड़ित परिवार को लंबे समय तक न्याय नहीं मिलना चिंता का विषय है और प्रशासन को मामले को संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए। अब SIA की ताजा कार्रवाई से इस पुराने हत्याकांड की जांच में नए सिरे से गतिविधियां बढ़ी हैं। एजेंसी ने अलग-अलग जिलों में नौ स्थानों पर तलाशी लेकर पुराने मामले से जुड़े संभावित दस्तावेज, रिकॉर्ड और अन्य सुराग तलाशे हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि 1990 की इस वारदात में कौन-कौन लोग शामिल थे और क्या मामले में ऐसे साक्ष्य अब भी मौजूद हैं, जिनके आधार पर आरोपियों तक पहुंचा जा सके। करीब 36 साल पुराने इस मामले में SIA की कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से जुड़े पुराने मामलों की जांच दोबारा आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। ताजा छापेमारी के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसी को क्या नए सुराग मिलते हैं और क्या इतने लंबे समय बाद इस हत्याकांड के आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है।















