मध्य प्रदेश में सरकारी गेहूं खरीदी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीदे गए गेहूं के सरकारी रिकॉर्ड और गोदामों में मौजूद वास्तविक स्टॉक का मिलान किया गया, तो करीब 86 हजार क्विंटल गेहूं कम पाया गया। इतनी बड़ी मात्रा में अनाज का गायब होना सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि गंभीर जांच का विषय है। रिपोर्टों के अनुसार सबसे अधिक शॉर्टेज सागर और जबलपुर जिलों में सामने आई है, जबकि ग्वालियर में भी गेहूं की कमी दर्ज की गई है। सवाल यह है कि हजारों क्विंटल गेहूं आखिर बिना किसी की नजर में आए कैसे गायब हो गया? क्या यह रिकॉर्ड में गड़बड़ी है, लापरवाही है या फिर किसी बड़े भ्रष्टाचार का संकेत? यह वही अनाज है जो किसानों की मेहनत और जनता के टैक्स के पैसों से खरीदा गया था। इसलिए इसकी जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है। अब सबकी निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर हैं कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान की जाएगी या नहीं। यदि दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो सरकारी खरीद व्यवस्था और किसानों के भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक हैं।














