उज्जैन। महाकाल की नगरी उज्जैन में एक विशाल हनुमान प्रतिमा इन दिनों आस्था और चर्चा का केंद्र बनी हुई है। सड़क चौड़ीकरण की जद में आए मंदिर का ढांचा हट चुका है, लेकिन खड़े हनुमान की विशाल प्रतिमा अब भी अपने स्थान पर अडिग खड़ी है। प्रशासन की ओर से प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से विस्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है। करीब 10 दिनों से चल रहे इस घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर इसे चमत्कार से जोड़कर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। मंदिर स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है, भजन-कीर्तन हो रहे हैं और कई लोग इसे आस्था का संकेत मान रहे हैं। हालांकि, प्रशासन या पुरातत्व विशेषज्ञों की ओर से इसे चमत्कार बताए जाने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

सड़क चौड़ीकरण की जद में आया मंदिर
उज्जैन के कंठाल चौराहे से क्षत्रिय चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी परियोजना के दायरे में खड़े हनुमान का मंदिर भी आया है। सड़क निर्माण के लिए मंदिर का ढांचा हटाया जा चुका है, लेकिन विशाल प्रतिमा को हटाना प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। कई प्रयासों के बाद भी प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हट सकी है। अब प्रशासन का पूरा जोर इस बात पर है कि प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित किया जाए।
क्या वाकई प्रतिमा जमीन में गहराई तक जुड़ी है?
तकनीकी जानकारों के मुताबिक प्रतिमा के नहीं हटने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। माना जा रहा है कि प्रतिमा का आधार जमीन के भीतर काफी गहराई तक हो सकता है और वह जिस शिला या आधार पर स्थापित है, उससे मजबूती से जुड़ी हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारी मशीनों के जरिए सीधे प्रतिमा को खींचना या उठाना जोखिम भरा हो सकता है। जरा सी चूक से प्रतिमा में दरार आने या उसके शिल्प को नुकसान पहुंचने की आशंका है। इसी वजह से प्रशासन जल्दबाजी के बजाय तकनीकी परीक्षण, खुदाई और विशेषज्ञों की राय के आधार पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।
1000 साल पुरानी होने की चर्चा, लेकिन अंतिम पुष्टि बाकी
इस पूरे मामले को खास बनाने वाली एक और बात प्रतिमा की संभावित ऐतिहासिक उम्र है। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक प्रतिमा मालवा क्षेत्र के बेसाल्ट पत्थर से निर्मित प्रतीत होती है। उनके अनुसार इसकी शैली का संबंध परमारकालीन परंपरा और राजा भोज के दौर से हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि अभी प्रतिमा की वास्तविक आयु को लेकर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। प्रतिमा पर लंबे समय से चढ़े सिंदूर की मोटी परत के कारण उसके मूल शिल्प और निर्माण शैली का विस्तृत अध्ययन भी मुश्किल है। वैज्ञानिक परीक्षण और विशेषज्ञों की विस्तृत जांच के बाद ही इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्पष्ट हो सकेगी।
श्रद्धालुओं की चिंता- प्रतिमा को नुकसान न पहुंचे
विश्व हिंदू परिषद के जिला धर्म प्रचार प्रमुख शैलू यादव के मुताबिक हिंदू समाज प्रतिमा के विस्थापन का विरोध नहीं कर रहा है। उनका कहना है कि पिछले करीब 10 दिनों से प्रशासन और समाज के बीच बातचीत चल रही है और परीक्षण तथा खुदाई की प्रक्रिया में भी सहयोग किया जा रहा है। उनके अनुसार श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रतिमा को हटाने के दौरान किसी तरह की क्षति न हो। उनका कहना है कि अगर प्रतिमा में दरार आती है तो इससे श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं। यही वजह है कि समाज की ओर से भी विशेषज्ञों की राय लेने और पूरी सावधानी के साथ निर्णय लेने की मांग की जा रही है।
मंदिर हट गया, अब सबसे बड़ी चुनौती प्रतिमा
सड़क चौड़ीकरण के लिए मंदिर का भवन हटाया जा चुका है। प्रतिमा को बारिश और अन्य संभावित नुकसान से बचाने के लिए फिलहाल उसके ऊपर कैनोपी लगाई गई है। नगर निगम की टीम प्रतिमा के आसपास तकनीकी जांच और खुदाई कर रही है, ताकि उसके आधार की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके। नगर निगम अपर आयुक्त संतोष टैगोर के मुताबिक इतनी विशाल और संभावित रूप से प्राचीन प्रतिमा को उसके मूल स्थान से निकालकर दूसरे स्थान तक सुरक्षित पहुंचाना बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसी वजह से इसमें समय लग रहा है।
सोशल मीडिया पर क्यों छाया ‘चमत्कार’?
पिछले कई दिनों में जब प्रतिमा को हटाने के प्रयास सफल नहीं हुए तो सोशल मीडिया पर इस घटना को धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाने लगा। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी और मंदिर स्थल पर भजन-कीर्तन का दौर भी शुरू हो गया। कुछ लोग इसे भगवान हनुमान की इच्छा से जोड़ते हुए कह रहे हैं कि “हनुमान जी अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते।” लेकिन फिलहाल यह श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक व्याख्या है। प्रशासन या विशेषज्ञों की ओर से प्रतिमा के नहीं हटने को किसी चमत्कार का आधिकारिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बताया गया है।
अब असली सवाल- प्रतिमा हटेगी या यहीं रहेगा रास्ता?
खड़े हनुमान की प्रतिमा ने सड़क चौड़ीकरण की पूरी परियोजना को ही एक अलग मोड़ दे दिया है। एक तरफ शहर के विकास और यातायात व्यवस्था के लिए सड़क चौड़ीकरण जरूरी बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रतिमा की सुरक्षा और संभावित ऐतिहासिक महत्व को लेकर सावधानी बरती जा रही है। अब देखना यह होगा कि विशेषज्ञों की जांच के बाद प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से विस्थापित करने का रास्ता निकलता है या प्रशासन को इसके लिए कोई वैकल्पिक तकनीकी समाधान तलाशना पड़ता है। फिलहाल उज्जैन में चर्चा एक ही बात की है—क्या यह आस्था का चमत्कार है या फिर हजारों किलो वजन और मजबूत आधार वाली एक प्राचीन प्रतिमा की तकनीकी चुनौती?













