भोपाल: मध्य प्रदेश भाजपा की राजनीति में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बीच कथित खींचतान को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच किसी खुले टकराव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी, संगठन और सरकार के बीच फैसलों को लेकर बदलते समीकरण तथा पार्टी के भीतर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने कई सवाल जरूर खड़े किए हैं। सबसे अहम बात यह है कि इसे फिलहाल व्यक्तिगत विवाद से ज्यादा सत्ता और संगठन के बीच संतुलन की राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष—दो अलग ताकत के केंद्र भाजपा की राजनीति में मुख्यमंत्री के पास सरकार और प्रशासन की कमान होती है, जबकि प्रदेश अध्यक्ष संगठन, कार्यकर्ताओं और पार्टी के चुनावी ढांचे को संभालता है। इसलिए दोनों पदों के बीच तालमेल जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही दोनों के प्रभाव क्षेत्र का संतुलन भी मायने रखता है। हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में प्रदेश भाजपा की नई कार्यसमिति का गठन हो चुका है, जिसमें मुख्यमंत्री मोहन यादव समेत शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी जगह मिली है। यानी संगठन के स्तर पर खंडेलवाल का दायरा बढ़ा है, जबकि सरकार के स्तर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं।जुलाई 2026 में खंडेलवाल ने मंत्रियों के राजनीतिक प्रभाव, कार्यक्षेत्र और विभागीय प्रदर्शन की समीक्षा से जुड़ी रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को भेजे जाने की बात कही थी। इसके बाद संभावित कैबिनेट फेरबदल की चर्चाओं ने भी राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ाई यहीं से यह सवाल उठने लगा कि संगठन सरकार के कामकाज की समीक्षा में कितनी सक्रिय भूमिका निभाएगा।
क्या मंत्रियों की समीक्षा से बढ़ी दूरी?
भाजपा के अंदर सरकार और संगठन के बीच समन्वय सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब संगठन की ओर से मंत्रियों के प्रदर्शन और राजनीतिक प्रभाव की समीक्षा की बात सार्वजनिक होती है तो इसके राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं। यही वजह है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच प्रभाव क्षेत्र के सवाल से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि समीक्षा या संगठनात्मक फैसलों का मतलब दोनों नेताओं के बीच टकराव है।
दतिया उपचुनाव के बाद बढ़ी चर्चा
दतिया उपचुनाव के बाद भाजपा के संगठनात्मक स्तर पर बदलाव और समीक्षा की चर्चाएं तेज हुईं। अगस्त में खंडेलवाल की दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात के बाद भी संगठन में संभावित बदलाव को लेकर अटकलें चलीं। ऐसे समय में प्रदेश अध्यक्ष की दिल्ली सक्रियता को स्वाभाविक संगठनात्मक प्रक्रिया माना जा सकता है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके अलग-अलग अर्थ निकाले गए।













