83 दिन तक SEIAA की बैठक नहीं होने के दौरान जारी हुईं मंजूरियां, केंद्र ने कहा- मामलों पर औपचारिक बैठक में फैसला जरूरी
भोपाल। मध्यप्रदेश में 237 पर्यावरण मंजूरियों को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। मामला राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) की कार्यप्रणाली और पर्यावरण मंजूरी देने की प्रक्रिया से जुड़ा है। बताया गया है कि SEIAA के अध्यक्ष और सदस्य सचिव के बीच करीब 83 दिनों तक चली खींचतान के कारण इस अवधि में प्राधिकरण की बैठक नहीं हो सकी। इसी दौरान 237 मामलों में पर्यावरण मंजूरी और अन्य फैसले जारी किए गए। अब इन मंजूरियों की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर मामले के दौरान केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से पेश जवाब में कहा गया है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के तहत पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया निर्धारित है और अंतिम निर्णय संबंधित प्राधिकरण को लेना होता है। केंद्र के अनुसार, जिन 237 मामलों में विवाद सामने आया है, उनमें राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) अपना मूल्यांकन पूरा कर चुकी थी, लेकिन SEIAA की बैठक नहीं होने के कारण अंतिम निर्णय की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद गठित फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने भी की थी। पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2025 में अतिरिक्त सचिव डॉ. अमनदीप गर्ग की अध्यक्षता में यह कमेटी गठित की थी। जांच के दौरान सामने आया कि मध्यप्रदेश SEIAA की करीब 83 दिनों तक बैठक नहीं हुई। इस अवधि में कुल 237 मामलों से जुड़े निर्णय सामने आए, जिनमें 186 पर्यावरण मंजूरी यानी EC, 37 टर्म्स ऑफ रेफरेंस यानी ToR, 10 रिजेक्शन और 4 ट्रांसफर या वैलिडिटी एक्सटेंशन से जुड़े मामले शामिल थे।
फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट में SEAC और SEIAA की भूमिकाओं को भी अलग-अलग बताया गया है। SEAC विशेषज्ञों की समिति है, जो परियोजनाओं का तकनीकी और पर्यावरणीय मूल्यांकन कर अपनी सिफारिश देती है, जबकि अंतिम पर्यावरण मंजूरी देने की जिम्मेदारी SEIAA की होती है। इसी वजह से विवादित 237 मामलों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या SEIAA की औपचारिक बैठक और निर्णय के बिना मंजूरी की प्रक्रिया पूरी मानी जा सकती है।
मामले में ‘डीम्ड क्लीयरेंस’ का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार के जवाब के मुताबिक संबंधित मामलों में SEIAA की बैठक नहीं होने के कारण अंतिम निर्णय की स्थिति पैदा नहीं हुई थी और अब इन मामलों को प्राधिकरण की औपचारिक बैठक में रखकर नियमानुसार फैसला किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, इस पूरे मामले की कानूनी व्याख्या और 237 मंजूरियों की स्थिति पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है।
अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह रहेगा कि 83 दिनों तक बैठक नहीं होने के दौरान जारी किए गए इन निर्णयों की कानूनी वैधता क्या है और संबंधित मामलों में आगे किस प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। सुनवाई के बाद ही 237 पर्यावरण मंजूरियों को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।













