बड़वानी। गांव के बच्चों के लिए एक सुरक्षित स्कूल भवन की मांग और सरकार के खर्च के बीच का सवाल बड़वानी के भामी गांव में आयोजित जनविश्वास अभियान के शिविर में सामने आया। ग्रामीणों ने माध्यमिक विद्यालय के लिए भवन की मांग प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल के सामने रखी, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक मंत्री ने विद्यार्थियों की संख्या कम होने का हवाला देते हुए सवाल किया कि इतने बच्चों पर दो-तीन लाख रुपये क्यों खर्च किए जाएं? मंत्री के इस कथित बयान के बाद अब गांव में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
![]()
सामुदायिक भवन में पढ़ने को मजबूर विद्यार्थी
भामी गांव में आयोजित शिविर के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि प्राथमिक विद्यालय के लिए भवन मौजूद है, लेकिन माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए उचित भवन उपलब्ध नहीं है। इसके चलते कक्षाएं सामुदायिक भवन में संचालित करनी पड़ रही हैं। ग्रामीणों के अनुसार, माध्यमिक विद्यालय का पुराना भवन लंबे समय से जर्जर हालत में है। उन्होंने मंत्री से भवन की मरम्मत या नए भवन के निर्माण की मांग रखी थी। ग्रामीणों का कहना है कि समस्या का स्थायी समाधान करने के बजाय सामुदायिक भवन में संचालन की बात कही गई।
2007 में बना भवन, कुछ साल बाद ही जर्जर
ग्रामीणों के मुताबिक माध्यमिक विद्यालय का भवन वर्ष 2007 में बनाया गया था, लेकिन कुछ समय बाद ही उसकी हालत खराब होने लगी। स्थिति ऐसी बनी कि वहां नियमित कक्षाएं संचालित करना मुश्किल हो गया। अब विद्यार्थियों को सामुदायिक भवन में पढ़ाया जा रहा है। ग्रामीणों का सवाल है कि अगर विद्यालय भवन जर्जर होने के कारण उपयोग के लायक नहीं है, तो उसकी मरम्मत या नया भवन बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
उसी जर्जर भवन में चल रही आंगनवाड़ी
मामला सिर्फ स्कूली विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस पुराने भवन में पहले माध्यमिक विद्यालय संचालित होता था, उसी परिसर में वर्तमान में आंगनवाड़ी का संचालन भी किया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, आंगनवाड़ी भवन की छत पर लगे पतरे पहले भी दो बार उड़ चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि बच्चों से जुड़ी संस्थाओं के लिए सुरक्षित भवन उपलब्ध कराना प्राथमिकता क्यों नहीं बन पा रहा है?
‘बच्चे कम हैं तो खर्च क्यों?’… बयान पर उठे सवाल
प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल के कथित बयान ने पूरे मुद्दे को एक अलग बहस में ला खड़ा किया है। ग्रामीणों के मुताबिक मंत्री ने विद्यार्थियों की संख्या का हवाला देते हुए पूछा कि इतने बच्चों पर दो-तीन लाख रुपये क्यों खर्च किए जाएं। यही बात अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल उठ रहा है कि क्या विद्यार्थियों की संख्या कम होने पर उन्हें सुरक्षित और स्थायी स्कूल भवन की सुविधा से वंचित किया जा सकता है? ग्रामीणों का तर्क है कि बच्चों की संख्या भले कम हो, लेकिन शिक्षा और सुरक्षित भवन की जरूरत कम नहीं होती। उनके मुताबिक स्कूल भवन कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के लिए बुनियादी आवश्यकता है।
शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
भामी की तस्वीर ग्रामीण इलाकों की उस चुनौती को सामने लाती है, जहां स्कूल मौजूद हैं, लेकिन भवन की स्थिति या उपलब्धता विद्यार्थियों की पढ़ाई के आड़े आ रही है। वर्षों से जर्जर भवन, सामुदायिक भवन में चलती कक्षाएं और आंगनवाड़ी से जुड़ी समस्याएं ग्रामीणों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। अब सवाल सिर्फ दो-तीन लाख रुपये के खर्च का नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा और सुरक्षित माहौल की प्राथमिकता का है। क्या कम संख्या वाले गांव के बच्चों के लिए भी स्थायी स्कूल भवन उपलब्ध कराया जाएगा या सामुदायिक भवन में ही पढ़ाई चलती रहेगी? मंत्री के बयान को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी आने वाले दिनों में तेज हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब प्रदेश में शिक्षा और विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं।













