जबलपुर। मध्य प्रदेश के जबलपुर से गरीबी और आर्थिक मजबूरी की एक बेहद मार्मिक तस्वीर सामने आई है। पत्नी की मौत के बाद उसके अंतिम संस्कार के लिए पति के पास पैसे नहीं थे। हालात ऐसे बने कि वह पत्नी के शव को नर्मदा नदी में विसर्जित करने का फैसला कर बैठा। इसी दौरान अस्पताल की एक नर्स की नजर उस पर पड़ गई और समय रहते मामला सामने आ गया। इसके बाद सामाजिक संस्था की मदद से महिला का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराया गया।

इलाज में खर्च हो गई जमा-पूंजी
जानकारी के मुताबिक, 51 वर्षीय श्याम विश्वकर्मा जबलपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर मगरमुहा गांव में मजदूरी करते हैं। उनकी पत्नी आरती विश्वकर्मा का करीब छह महीने पहले एक्सीडेंट हो गया था। हादसा किस वाहन से हुआ, इसकी जानकारी नहीं होने के कारण उस समय पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई थी। श्याम ने अपनी पत्नी का इलाज कराने में काफी पैसा खर्च किया। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर थी और इलाज के खर्च के बाद उनके पास कोई बड़ी रकम नहीं बची थी।

पत्नी की मौत के बाद सामने आया सबसे बड़ा संकट
आरती की जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। पत्नी की मौत के बाद श्याम के सामने अंतिम संस्कार कराने की चुनौती खड़ी हो गई। पैसे नहीं होने के कारण वह पत्नी का शव लेकर अस्पताल से निकलने की तैयारी करने लगा। बताया गया कि श्याम ने आर्थिक मजबूरी में पत्नी के शव को नर्मदा नदी में विसर्जित करने का फैसला किया था। उसका कहना था कि वह अंतिम संस्कार का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है।
नर्स की नजर पड़ी और खुला पूरा मामला
जब श्याम पत्नी का शव लेकर अस्पताल से निकलने की तैयारी कर रहा था, तभी एक नर्स की नजर उस पर पड़ी। नर्स ने उससे बातचीत की तो पूरे मामले की जानकारी सामने आई। इसके बाद नर्स ने मामले की जानकारी गरीब नवाज कमेटी के इनायत अली को दी। सूचना मिलने के बाद इनायत अली मौके पर पहुंचे और श्याम की स्थिति को समझा।
ग्वारीघाट में कराया गया अंतिम संस्कार
इनायत अली ने श्याम विश्वकर्मा की मदद की और उनकी पत्नी आरती के अंतिम संस्कार की व्यवस्था कराई। इसके बाद ग्वारीघाट में आरती का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक कराया गया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों के लिए किसी अपने की मौत के बाद अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत जरूरत भी कई बार कितनी बड़ी चुनौती बन जाती है। वहीं, अस्पताल की नर्स और सामाजिक संस्था की संवेदनशील पहल ने परिवार को संकट की इस घड़ी में सहारा दिया।













