जबलपुर / भोपाल:
मध्य प्रदेश में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) का बढ़ता आतंक और आए दिन होने वाली डॉग बाइट की घटनाओं पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को दोटूक शब्दों में पूछते हुए एक्शन टेकन रिपोर्ट तलब की है कि सार्वजनिक स्थलों पर आम जनता और बच्चों की सुरक्षा के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
मध्य प्रदेश में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) का बढ़ता आतंक और आए दिन होने वाली डॉग बाइट की घटनाओं पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को दोटूक शब्दों में पूछते हुए एक्शन टेकन रिपोर्ट तलब की है कि सार्वजनिक स्थलों पर आम जनता और बच्चों की सुरक्षा के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
यह पूरी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद हाईकोर्ट द्वारा ली गई स्वतः संज्ञान (Suo Motu) जनहित याचिका पर हो रही है। अदालत इस मामले में अब आगामी 3 नवंबर को अंतिम सुनवाई करेगी, जिसके बाद यह रिपोर्ट देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को भेजी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ‘स्वतः संज्ञान’
सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में आवारा कुत्तों के जानलेवा होते हमलों को देखते हुए ‘शहर आवारा कुत्तों के आतंक में, बच्चे चुका रहे हैं कीमत’ (Cities in the grip of stray dog menace, children paying the price) शीर्षक से एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट को इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेकर लगातार निगरानी करने के निर्देश दिए थे। इसी कड़ी में एमपी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच इस गंभीर मामले की निगरानी कर रही है।
सरकार का दावा: 6 महीने में 15 हजार कुत्तों की नसबंदी
सुनवाई के दौरान राज्य के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल की ओर से हाईकोर्ट में एक विस्तृत जवाब पेश किया गया। सरकार ने अदालत को बताया कि:
- पिछले 6 महीनों के भीतर पूरे मध्य प्रदेश में 15,000 से अधिक आवारा कुत्तों की नसबंदी (Sterilisation) और उनका टीकाकरण (Vaccination) किया गया है।
- व्यावसायिक खाद्य प्रतिष्ठानों (होटल, ठेलों और चौपाटियों) के आसपास कचरा प्रबंधन को लेकर कड़े निर्देश जारी किए गए हैं।
- दुकानदारों और वेंडरों को खाने का वेस्टेज खुले में न फेंकने और उसे बंद डस्टबिन में रखने की सलाह दी जा रही है, ताकि इन जगहों पर आवारा कुत्ते झुंड न बनाएं।
सुनवाई के दौरान अदालत मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रायन डिसिल्वा ने सरकार द्वारा अब तक उठाए गए कदमों को प्राथमिक तौर पर संतोषजनक बताया, लेकिन अदालत इस बात पर पूरी तरह आश्वस्त होना चाहती है कि ये आंकड़े केवल कागजों तक सीमित न रहें।
नगर निगमों के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर
इससे पहले भी हाईकोर्ट की इंदौर और भोपाल पीठ में इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस हो चुकी है। इंदौर नगर निगम ने जब कोर्ट में ढाई लाख से ज्यादा कुत्तों की नसबंदी का दावा किया था, तब अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि जब जज खुद मॉर्निंग वॉक पर निकलते हैं, तो उन्हें हर जगह आवारा कुत्ते नजर आते हैं। ऐसे में मैदानी हकीकत और सरकारी दावों में भारी अंतर है। भोपाल में भी नगर निगम ने करीब 840 ऐसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों को चिह्नित किया है, जहाँ आवारा कुत्तों का सबसे ज्यादा जमावड़ा रहता है।
क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के कड़े गाइडलाइंस?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक आदेशों में स्पष्ट किया है कि:
- सार्वजनिक स्थलों से स्थानांतरण: स्कूल, कॉलेज, जिला अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे हाई-फुटफॉली वाले सार्वजनिक परिसरों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाया जाए।
- शेल्टर होम में शिफ्टिंग: इन संवेदनशील जगहों से हटाए गए कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद वापस उसी जगह छोड़ने के बजाय स्थायी रूप से डॉग शेल्टर होम में शिफ्ट किया जाए।
- यूट्रेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति: कोर्ट ने बेहद आक्रामक, लाइलाज रूप से बीमार या पागल (Rabid) हो चुके कुत्तों को मानवीय तरीके से इच्छामृत्यु देने की भी अनुमति दी है ताकि इंसानी जानों को बचाया जा सके।
3 नवंबर को होगी अंतिम सुनवाई
एमपी हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह सरकार के जवाब और अब तक की कार्रवाइयों की समीक्षा 3 नवंबर को दोपहर 2:30 बजे करेगी। इसके बाद एक फाइनल रिपोर्ट तैयार कर 17 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले वहां सबमिट की जाएगी। अब देखना यह होगा कि सरकार आगामी दिनों में इस व्यवस्था को कितनी मुस्तैदी से जमीन पर लागू कर पाती है।













