नई दिल्ली। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से जुड़े मामले में दिल्ली की अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले ही मतदाता सूची में दर्ज हो गया था। इस शिकायत पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 2025 में पुलिस जांच और FIR के निर्देश देने से इनकार कर दिया था। अब सेशन कोर्ट ने उस आदेश को निरस्त करते हुए मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया है।
कोर्ट ने पुराने आदेश पर क्यों उठाए सवाल?
स्पेशल जज विशाल गोगने की अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट का पिछला आदेश पर्याप्त कारणों वाला नहीं था। अदालत के मुताबिक, आदेश में इस अहम सवाल पर स्पष्ट विचार नहीं किया गया कि शिकायत में किसी संज्ञेय अपराध के आरोप बनते हैं या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में शिकायत को केवल रिकॉर्ड की स्थिति या दस्तावेजों की फोटोकॉपी के आधार पर खारिज करने के बजाय उपलब्ध सामग्री और पुलिस के पक्ष पर भी उचित तरीके से विचार किया जाना चाहिए था।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की मतदाता सूची में दर्ज था, जबकि उनके अनुसार भारतीय नागरिकता 1983 में मिली थी। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस जांच और FIR दर्ज करने की मांग की थी। मामला पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट पहुंचा था। 11 सितंबर 2025 को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शिकायत खारिज कर दी थी। इसके बाद शिकायतकर्ता ने इस आदेश को सेशन कोर्ट में चुनौती दी।
अब आगे क्या होगा?
सेशन कोर्ट ने मामले को वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया है कि संबंधित पक्षों को सुनने के बाद कारणों सहित नया आदेश पारित किया जाए। अदालत ने पुलिस के पक्ष पर भी विचार करने और आवश्यक प्रक्रिया का पालन करने को कहा है। मामला 29 सितंबर को ACJM के सामने सूचीबद्ध होने की जानकारी सामने आई है। फिलहाल अदालत के ताजा आदेश का मतलब यह नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। अदालत ने केवल मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत खारिज किए जाने के तरीके पर सवाल उठाते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई का रास्ता खोला है। अब अगला फैसला मजिस्ट्रेट कोर्ट की सुनवाई के बाद सामने आएगा।













